पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व, विशेषकर जनरल आसिम मुनीर द्वारा लीबिया को पुराने और अप्रचलित हथियार बेचने की कोशिशें रक्षा गलियारों में काफी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। दरअसल, पाकिस्तान लंबे समय से अपने 'फुस्स' हो चुके रक्षा उपकरणों, जैसे कि पुराने JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों के शुरुआती ब्लॉक, मखलूक किस्म के बख्तरबंद वाहन और कम मारक क्षमता वाली एंटी-टैंक मिसाइलों के लिए खरीदार ढूंढ रहा है। लीबिया जैसा देश, जो आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है, पाकिस्तान के लिए एक मुफीद बाजार बन गया है जहाँ वह अपने उन हथियारों को 'टिकाने' के जुगाड़ में है जिन्हें आधुनिक युद्धक्षेत्र में कोई भाव नहीं देता। इन हथियारों को 'फुस्स' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनकी तकनीक चीन पर आधारित है और इनका प्रदर्शन कई अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों में औसत दर्जे का रहा है। जनरल मुनीर की यह रणनीति न केवल पाकिस्तान के खाली विदेशी मुद्रा भंडार को भरने की एक हताशा भरी कोशिश है, बल्कि यह उन पुराने हथियारों से छुटकारा पाने का एक तरीका भी है जिनका रखरखाव अब पाकिस्तानी सेना के लिए बोझ बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये हथियार लीबिया की सेना को मजबूती देने के बजाय तकनीकी समस्याओं और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण उनके लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं। कुल मिलाकर, यह 'जुगाड़' सैन्य कूटनीति से ज्यादा एक नाकाम व्यापारिक सौदेबाजी नजर आती है।
Tuesday, December 23, 2025
पाकिस्तान के वे कौन से फुस्स हथियार हैं जो आसिम मुनीर लीबिया को टिकाने के जुगाड़ में हैं
पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व, विशेषकर जनरल आसिम मुनीर द्वारा लीबिया को पुराने और अप्रचलित हथियार बेचने की कोशिशें रक्षा गलियारों में काफी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। दरअसल, पाकिस्तान लंबे समय से अपने 'फुस्स' हो चुके रक्षा उपकरणों, जैसे कि पुराने JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों के शुरुआती ब्लॉक, मखलूक किस्म के बख्तरबंद वाहन और कम मारक क्षमता वाली एंटी-टैंक मिसाइलों के लिए खरीदार ढूंढ रहा है। लीबिया जैसा देश, जो आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है, पाकिस्तान के लिए एक मुफीद बाजार बन गया है जहाँ वह अपने उन हथियारों को 'टिकाने' के जुगाड़ में है जिन्हें आधुनिक युद्धक्षेत्र में कोई भाव नहीं देता। इन हथियारों को 'फुस्स' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनकी तकनीक चीन पर आधारित है और इनका प्रदर्शन कई अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों में औसत दर्जे का रहा है। जनरल मुनीर की यह रणनीति न केवल पाकिस्तान के खाली विदेशी मुद्रा भंडार को भरने की एक हताशा भरी कोशिश है, बल्कि यह उन पुराने हथियारों से छुटकारा पाने का एक तरीका भी है जिनका रखरखाव अब पाकिस्तानी सेना के लिए बोझ बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये हथियार लीबिया की सेना को मजबूती देने के बजाय तकनीकी समस्याओं और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण उनके लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं। कुल मिलाकर, यह 'जुगाड़' सैन्य कूटनीति से ज्यादा एक नाकाम व्यापारिक सौदेबाजी नजर आती है।
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